Wednesday, July 22, 2020

Story of kg class in hindi | kg class ki Bacchon keliye hindi Story

    Hey Kids aj mein yeha par tumko khushi karne keliye Story of kg class in hindi batane ja raha hu, yeh jo kahani hain jaroor tumhe a66a lage ga . 

   Agar aap iss tarah chota chota hindi Kahaniya parna chahoge toh jaroor mera iss website par visit karo. Yeha pe main ne iss tarah ki kahaniya jo Story of kg class in hindi main hota hain woh likhta hu .



Story of kg class in hindi


     

गौतम की बुद्धत्व प्राप्ति


कपिलवस्तु के शाक्यवंशीय राजा सुद्धोदन और महिषी महामाया के पुत्र सिद्धार्थ गौतम (संस्कृत व हिन्दी : सिद्धार्थ गौतम झ्र५६३ ई.पू.- ४८७ ई.पू. का जन्म वैशाख-पूर्णिमा के दिन लुम्बिनी के उपवन में स्थित एक साल-वृक्ष के नीचे हुआ था जब उनकी माता अपने माता-पिता से मिलने अपने मायके देवदह जा रही था।

पुत्र-जन्म के तत्काल बाद महामाया वापिस कपिलवस्तु लौट आयी थी। तावविंस देवों से शिशु के जन्म की सूचना पाते ही शिशु के दादा सीहहनु के गुरु तथा राजपुरोहित तत्क्षण कपिलवस्तु पहुँचे। Story of kg class in hindi

   शिशु को अपनी गोद में उठा या जैसे ही शिशु को निकट से देखा तो उनकी आँखें पहले तो खुशी से चमक उठीं लेकिन फिर आँसुओं में डूब गयीं। राजा सुद्धोदन द्वारा कारण पूछे जाने पर उन्होंने बताया था, " यह शिशु बुद्ध बनने वाला है इसलिए मैं प्रसन्न हूँ। किन्तु दु:ख इस बात का है कि शिशु की बुद्धत्व-प्राप्ति तक मैं जीवित नहीं रह सकूंगा।" 

शिशु के जन्म के पाँचवे दिन उसके नामकरण के अवसर पर एक सौ आठ ज्योतिषियों को आमंत्रित किया गया था जिन में आठ विलक्षण ज्योतिषी भी थे।

   उन आठ में से छ: राम, धज, लक्खण, मन्ती, भोज और सुदन्त ने यह भविष्यवाणी की थी कि वह शिशु या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या एक बुद्ध। किन्तु सबसे कम उम्र के ज्योतिषी कोण्डञ्ञ का कथन था कि वह शिशु निश्चित रुप से एक बुद्ध बनेगा। 

शिशु का नाम सिद्धार्थ गौतम रखा गया। सातवें दिन सिद्धार्थ की माता का देहांत हो गया, तब उसके लालन-पालन का दायित्व उसकी मौसी महापजापति ने लिया (वह भी सुद्धोदन की एक रानी थी ; और उनका विवाह भी सुद्धोदन के साथ उसी दिन हुआ था जिस दिन महामाया का।)

सोलह वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ ने शाक्यों की एक सभा में अपने अद्भुत युद्ध-कौशल दिखाये। सारभड़ग जातक के अनुसार तो उन्होंने एक ऐसे धनुष को उठा अपने कर्तव्य दिखाये थे जिसे हज़ार आदमी मिल कर भी नहीं उठा सकते थे। Story of kg class in hindi

   किंवन्दन्ती तो यह है कि उनके शौर्य से प्रसन्न हो उन्हें चालीस हजार शाक्य-कन्याओं के हाथ प्राप्त हुए थे जिनमें सुधबुद्ध की राजकुमारी बिम्बा उनकी प्रमुख रानी बनी थी, जो बाद में राहुलमता के नाम से बौद्ध-साहित्य में विख्यात हैं। झ्र बिम्बा ही भद्दकच्छा, सुभद्दका और यशोधरा (हिन्दी-संस्कृत : यशोधरा) के नाम से जानी जाती हैं। 

उन्नतीस वर्षों तक ठरभ्भ', ठसुरभ्भ' और ठसुभ' नामक प्रासादों में राज-वैभव भोगने के बाद सिद्धार्थ संसार से विमुक्त हो संन्यास को उन्मुख हुए। 

कहा जाता है कि उन्होंने एक बार किसी रोगी को देखा और अनुभव किया कि हर कोई जो पैदा होता है रोग और व्याधि से पीडित होता रहता है। फिर उन्होंने किसी वृद्ध को देखा।

   इससे उन्हें यह विदित हुआ कि हर कोई जो जन्म लेता है, कालान्तर में वृद्ध भी होता है तत: उसके हाथ-पैर शिथिल और जर्जर हो जाते हैं। फिर जब उन्होंने एक मृत को देखा तो यह ज्ञान पाया कि हर कोई जो जन्म लेता है एक दिन मृत हो अपने संसार और नश्वर शरीर को भी छोड़ जाता है तब सारे सुख, सुविधाओं और वैभव की वस्तुएँ निरर्थक हो जाती है।

   अत: संसार सारहीन है। अंतत: जब उन्होंने वैभव का त्याग कर सत्य का अन्वेषण कर रहा था तो उन्होंने भी संसारिकता का परिव्याग कर संन्यास वरण कर गृह-त्याग किया। Story of kg class in hindi

शाक्य कोलि और मल्ल राज्यों को पार कर संन्यासी के रुप में वे राजगीर आदि स्थानों पर भटकने लगे। इसी क्रम में उन्होंने अकार-ककाम और उद्धकराम पुत्त को अपना गुरु बनाया। किन्तु उनके दर्शन व विचार से वे संतुष्ट नहीं हुए।

   अत: वे उरुवेका के सेनानीगाम पहुँचे और छ: वर्षा तक पाँच भिक्षुओं के साहचर्य में कठिन तपस्या की। कठिन चरम तप दो मार्ग की अनुपभुक्तटा जान पुन: वे साधारण भोजन ग्रहण करने को प्रेरित हुए जिससे खिन्न हो उनके पाँच भिक्षु-मित्र खिन्न हो उनका साथ छोड़ सारनाथ के इसिपत मिगदाथ को प्रस्थान कर गये।

सिद्धार्थ की साधारण भोजन ग्रहण करने की इच्छा सुजाता नाम की एक कन्या ने सोने की कटोरी में खीर अर्पित कर पूरी की। वह दिन वैशाख पूर्णिमा का था। गौतम ने निरञजरा नदी में स्नान कर खीर खाई और फिर कटोरी नदी में ही छोड़ दी।

   जो डूबती हुई नागराज काल के निवास-स्थान पर जा पहुँची थी। फिर सारा दिन साल-उपवन में व्यतीत कर शाम को वे पीपल के एक पेड़ के नीचे जा बैठे। वहीं सोत्यीय नामक एक घसियारे ने उन्हें आठ-मुट्ठी घास दिये। घास को उन्होंने पूर्व दिशा की ओर रख उसकी आसनी बनायी।

   फिर उसपर बैठकर उन्होंने यह प्रतिज्ञा की कि जबतक वे बोधि नहीं प्राप्त करते तबतक वहाँ से नहीं उठेंगे। उनकी प्रतिज्ञा के तेज से महाब्रह्म और सारे देव उनके सामने प्रकट हो उनकी स्तुति करने लगे। Story of kg class in hindi

किन्तु उनकी दृढ़ मार (शैतान) ने उनपर आक्रमण किया। जिसके भय से सारे देव वहाँ से भाग खड़े हुए। मार से उनकी रक्षा तब केवल दस पारमियों ने की। इन पारमियों को उन्होंने बोधिसत्व बनने के बाद के पाँच सौ पचास जन्मों के कठिन संघर्ष के क्रम में अर्जित किया था।

   (पारमी दस होते हैं-दान, शील, नेक्खम्म या नौकम्र्म) प्रज्ञा, वीर्य, खन्ति (या धैर्य), सत्य, अधिष्ठान, मेत्ता (या मैत्रेय) और उपेक्खा (या समभाव) अथवा अनासक्ति।

गौतम से परास्त हो जब मार और उसकी सेनाएं भाग खड़ी हुई तो सारे देवों ने विजेता की जयजयकार की। Story of kg class in hindi

तप में लीन गौतम ने रात के पहले प्रहर में अपने पूर्व जन्मों को जाना; दूसरे प्रहर में दिव्य-चक्षु को पाया, तीसरे प्रहर में परिच्यसमुप्पाद के ज्ञान को और अंतत: प्रत्यूष-काल में सम्बोधि की प्राप्ति की।

   ज्ञान को जिससे वे " पच्चेक (प्रत्येक) बुद्ध बने। परिच्चसमुप्पाद के सिद्धान्त का सुखद मनन उन्होंने प्रथम सात दिनों तक उसी बोधि-वृक्ष के नीचे बैठ किया। दूसरा सप्ताह उन्होंने अजपाल निग्रोध वृक्ष के नीचे बिताया जहाँ उनकी भेंट एक घमण्डी ब्राह्मण से हुई थी और जहाँ उन्होंने मार की तीनों कन्याओं को परास्त किया था।

   (उन कन्याओं के नाम (तृष्णा), अरति और राग थे।) तीसरा सप्ताह उन्होंने मुचलिन्द तालाब में नागराज मुचलिन्द के फनों के नीचे बैठ बिताया था। चौथे सप्ताह वे राजायतन पेड़ के नीचे बैठे रहे जहाँ उन्होंने तपुस्स और मल्लिक को बिना किसी देखना सुनाये ही अपना अनुयायी बनाया। 

तत्पश्चात ब्रह्मसहमपति के आग्रह पर उन्होंने पीड़ित मानव के उत्थान के लिए धम्मचक्क-पनत्तन का निश्चय किया । दूसरों के उत्थान की प्रतिज्ञा से वे सब्बञ्ञू (सर्वज्ञ) बुद्ध कहलाये। तब अपनी धम्म देशना के प्रवर्त्तन हेतु अपने पाँच तपस्वी मित्रों को योग्य पाया जो उन दिनों वाराणसी के इसिपतन मिगदाय में वास कर रहे थे।

   इस धम्म-चक्र प्रवर्तन की महत्ता को अशोक-कालीन सारनाथ सिंह स्तम्भ में दर्शाया गया है जो आज भारतीय गणराज्य का राजकीय चिह्म है। चार-मुख वाला वह सिंह-स्तंभ बुद्ध के धम्म या देशना का सिंह नाद आज भी हर दिशा में गुंजाता प्रतीत होता है। Story of kg class in hindi

   पुन: सिंह-स्तंभ में अंकित चक्र जो अशोक-चक्र के नाम से जाना जाता है, आज जो भारतीय राष्ट्रीय ध्वज पर बड़े गौरव से लहराता रहता है वस्तुत: धर्म-चक्र का ही प्रतीक है। 




   ## main samajhta hai ki aapko yeh sab Story of kg class in hindi achcha Laga hai. Ine sare Story of kg class in hindiper ek moral likha hua hai. Jisko aapko jarur pasand hona chahie.

    agar yeah Story of kg class in hindi aapko achcha Laga to aap jarur doston ki shaadi share kariye aur aur aapko is tarah aur aur moral stories padhne ke liye hamare website per dekhiae, welcome again :)


Disqus Comments